Posts

Showing posts from December, 2018

चीन से चाय उगाने का राज़ कैसे चुराया अंग्रेज़ों ने?

या तो उस्तरा इतना कुंद था या फिर कुली ही ऐसा अनाड़ी था कि फ़ॉर्च्यून को लगा कि 'जैसे वह मेरा सिर मूंड नहीं रहा बल्कि खुरच रहा है.' उसकी आंखों से आंसू जारी होकर गालों पर ढुलकने लगे. यह घटना सिंतबर 1848 में चीनी शहर शंघाई से कुछ दूर हुई थी. फ़ॉर्च्यून ईस्ट इंडिया कंपनी का जासूस था जो चीन के अंदरूनी इलाक़ों में जाकर वहां से चाय की पत्तियां चुराने के काम पर आया हुआ था. लेकिन उस मक़सद के लिए उन्हें सबसे पहले भेष बदलना था जिसकी पहली शर्त है कि वह चीन रिवाज के मुताबिक़ माथे के ऊपरी हिस्से से बाल मुंडवा लें. इसके बाद फ़ॉर्च्यून के बालों में एक चोटी जोड़ दी गई और चीनी वस्त्र पहना दिए गए. साथ ही उन्हें कहा गया कि वह अपना मुंह बंद रखें. हालांकि, एक दिक्कत और थी जिसे छिपाना आसान नहीं था. फ़ॉर्च्यून का क़द आम चीनियों के मुक़ाबले एक फ़ुट से भी लंबा था. उसका हल उन्होंने कुछ यूं निकाला कि लोगों से कह दिया जाएगा कि वह चीन की दीवार के दूसरी ओर से आए हैं जहां के लोग लंबे होते हैं. इस काम में बहुत कुछ दांव पर लगा हुआ था. अगर फ़ॉर्च्यून कामयाब हो जाता तो चाय पर चीन का हज़ारों साल का आध...

कैसे बाहर निकलीं दलदल में फंसी ज़िंदगियां

पश्चिम बंगाल के एक छोटे से गाँव त्रिदिपनगर में रहने वाली मीना गाएन रोज़ाना घर से निकलकर सुंदरबन के उस इलाक़े में जाकर गोलगप्पे का स्टॉल लगाती हैं जहाँ पर्यटक आते हैं. उन दिनों को याद करते हुए मीना बताती हैं, "कीचड़ से निकलने के लिए मुझे अपनी साड़ी उठाकर निकलना पड़ता, अजीब लगता. मैं सोचती थी कि कब तक ऐसा करते रहेंगे. ठेले को कीचड़ से निकालने के लिए ख़ूब ज़ोर लगाना पड़ता... ठेले को मुख्य सड़क से दूर छोड़ मैं एक-एक कर ठेले का सामान सड़क पर ले जाती. कई बार सामान चोरी हो जाता. 60-70 रुपए रोज़ कमा पाती थी. इसलिए फ़ैसला किया कि ख़ुद ही सड़क बनाऊंगी. मेरी कमाई अब 300-400 रुपए हो जाती है. कुछ बचा नहीं पाती पर बच्चों की परवरिश कर सकती हूँ. जब मेरा बेटा पैदा होने वाला था तो ख़राब सड़क की वजह से मैं गिर गई थी..मुझे लगा कि मेरा बच्चा मर जाएगा. मैं उस दिन को याद नहीं करना चाहती." ये सब बताते-बताते मीना की आँखे भर आती हैं. उनके कच्चे मकान में ख़ामोशी छा जाती है. मेरे सवाल भी जैसे कहीं गुम हो गए. ज़िंदगियां हुईं बेहतर ख़ुद को संभालते हुए मीना बताती हैं कि पिछले दो सालों में उनके जैसी...

इस बुज़ुर्ग दंपती के जुनून के सामने नतमस्तक हैं लोग

दूसरे बुज़ुर्गों की तरह वे भी आराम से अपना बुढ़ापा गुज़ार सकते थे लेकिन डेबी और माइकल कैंपबेल अलग तरह से रिटायरमेंट इंजॉय कर रहे हैं. इस बुज़ुर्ग दंपती के पास जो कुछ भी था उसे बेचकर वे दुनिया देखने निकल पड़े हैं . पिछले पांच साल से वे बस घूम ही रहे हैं और अब तक 80 देश देख चुके हैं. 2013 में जब उन्होंने सफ़र शुरू किया था तब डेबी 62 साल की थीं और माइकल 72 साल के थे. उनका सफ़र जारी है और अभी वे थके नहीं हैं. कैंपबेल दंपती "सीनियर नोमाड्स" या बूढ़े घुमक्कड़ नाम से ब्लॉग लिखते हैं. इसमें वे अपनी यात्राओं के ब्यौरे लिखते हैं. अमरीका के सिएटल से शुरू करके वे अब तक दुनिया के 250 शहर जा चुके हैं. डेबी कहती हैं, "हम जानने को लालायित थे. दुनिया में देखने को बहुत कुछ था और हम रुकने को तैयार नहीं." सबकुछ बेच दिया डेबी और माइकल दोनों नौकरी करते थे. सिएटल में उनका एक घर था. माइकल उन दिनों को याद करके कहते हैं, "अगर हम नौकरी छोड़ रहे थे और घर को किराये पर लगा रहे थे तो सिएटल में हमारा कोई खर्च नहीं था." कोई भी सफ़र बिना पैसे के नहीं होता. खर्च जुटाने के लिए ...