चीन से चाय उगाने का राज़ कैसे चुराया अंग्रेज़ों ने?

या तो उस्तरा इतना कुंद था या फिर कुली ही ऐसा अनाड़ी था कि फ़ॉर्च्यून को लगा कि 'जैसे वह मेरा सिर मूंड नहीं रहा बल्कि खुरच रहा है.' उसकी आंखों से आंसू जारी होकर गालों पर ढुलकने लगे.

यह घटना सिंतबर 1848 में चीनी शहर शंघाई से कुछ दूर हुई थी. फ़ॉर्च्यून ईस्ट इंडिया कंपनी का जासूस था जो चीन के अंदरूनी इलाक़ों में जाकर वहां से चाय की पत्तियां चुराने के काम पर आया हुआ था.

लेकिन उस मक़सद के लिए उन्हें सबसे पहले भेष बदलना था जिसकी पहली शर्त है कि वह चीन रिवाज के मुताबिक़ माथे के ऊपरी हिस्से से बाल मुंडवा लें. इसके बाद फ़ॉर्च्यून के बालों में एक चोटी जोड़ दी गई और चीनी वस्त्र पहना दिए गए. साथ ही उन्हें कहा गया कि वह अपना मुंह बंद रखें.

हालांकि, एक दिक्कत और थी जिसे छिपाना आसान नहीं था. फ़ॉर्च्यून का क़द आम चीनियों के मुक़ाबले एक फ़ुट से भी लंबा था. उसका हल उन्होंने कुछ यूं निकाला कि लोगों से कह दिया जाएगा कि वह चीन की दीवार के दूसरी ओर से आए हैं जहां के लोग लंबे होते हैं.

इस काम में बहुत कुछ दांव पर लगा हुआ था. अगर फ़ॉर्च्यून कामयाब हो जाता तो चाय पर चीन का हज़ारों साल का आधिपत्य समाप्त हो जाता और ईस्ट इंडिया कंपनी हिंदुस्तान में चाय उगाकर सारी दुनिया में बेचना शुरू कर देती.

लेकिन दूसरी ओर अगर वह पकड़ा जाता तो उसकी सिर्फ़ एक ही सज़ा थी, मौत. उसकी वजह ये थी कि चाय की पैदावार चीन में एक राज़ थी और उसके शासक सदियों से इस राज़ को छिपाने के लिए पूरी कोशिश करते आए थे.

एक रिसर्च के मुताबिक़, पानी के बाद चाय दुनिया का सबसे प्रसिद्ध पेय पदार्थ है और दुनिया में रोज़ तकरीबन दो अरब लोग अपने दिन की शुरुआत चाय के गर्म प्याले से करते हैं.

ये अलग बात है कि इस दौरान कम ही लोगों के दिमाग़ में ये ख़याल आता होगा कि यह चीज़ उन तक कैसे पहुंची.

चाय की ये कहानी किसी रहस्यमय उपन्यास से कम नहीं है. ये ऐसी कहानी है जिसमें जासूसी रोमांच भी है, भाग्यशाली क्षण भी और दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएं भीं.

चाय की शुरुआत कैसे हुई, इसके बारे में कई कहानियां मशहूर हैं. एक में मशहूर चीनी बादशाह शिनूंग ने सफ़ाई के इरादे के बाद तमाम जनता को आदेश दिया कि वह पानी उबालकर पिया करें.

एक दिन किसी जंगल में बादशाह का पानी उबल रहा था कि चंद पत्तियां हवा से उड़कर बर्तन में जा गिरीं. शिनूंग ने जब ये पानी पिया तो न सिर्फ़ उसे स्वाद पसंद आया बल्कि उसे पीने से उसके बदन में चुस्ती भी आ गई.

ये चाय की पत्तियां थीं और उनको पीने के बाद बादशाह ने जनता को आदेश दिया कि वह उसे आज़माएं. इसके बाद ये पेय पदार्थ चीन के कोने-कोने तक पहुंच गया.

यूरोप को सबसे पहले 16वीं सदी में चाय के बारे में पता चला जब पुर्तगालियों ने इसकी पत्ती का व्यापार शुरू किया. एक सदी के अंदर-अंदर चाय दुनिया के विभिन्न इलाक़ों में पी जाने लगी. लेकिन ख़ासतौर पर ये अंग्रेज़ों को उतनी पंसद आई कि घर-घर पी जाने लगी.

ईस्ट इंडिया कंपनी पश्चिम से हर सामान की व्यापार की ज़िम्मेदार थी. उसे चाय की पत्ती महंगे दामों पर चीन से ख़रीदनी पड़ती थी और वहां से लम्बे समुद्री रास्ते से दुनिया के बाक़ी हिस्सों में यह पहुंचती थी जहां इसके दाम बढ़ जाते थे.

इस वजह से अंग्रेज़ चाहते थे कि वह ख़ुद हिंदुस्तान में इसे उगाएं ताकि चीन का पत्ता कट जाए.

इस इरादे में सबसे बड़ी रुकावट ये थी कि चाय का पौधा कैसे उगता है और इससे चाय कैसे हासिल की जाती है, इसके बारे में किसी को भी नहीं मालूम था. यही कारण था कि कंपनी ने रॉबर्ट फॉर्च्यून को इस पर जासूसी के लिए भेजा था.

इस मक़सद के लिए उसे चीन के उन इलाक़ों तक जाना था जहां शायद मार्को पोलो के बाद किसी यूरोप के शख़्स ने क़दम नहीं रखा था. उसे मालूम हुआ था कि फ़ोजियान प्रांत के पहाड़ों में सबसे अच्छी काली चाय उगती है इसलिए उसने अपने एक साथी को वहां जाने के लिए कहा.

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