जॉर्ज फ़र्नांडिस कुछ कर गुज़रने को बेचैन रहते थे- नज़रिया
जॉर्ज साहब अर्थात जॉर्ज फ़र्नांडिस का जाना हमारी मौजूदा राजनीति के एक दौर का अंत है. इस लेखक के लिए चालीस साल से ज़्यादा समय उनकी धारा की वैचारिक राजनीति में कभी प्रेम कभी लड़ाई करने के बाद उनका जाना यह काफ़ी कुछ निजी नुकसान भी लगता है. पर जिस हालत वे पिछले कई वर्षों से पड़े थे वह उनकी शख़्सियत के हिसाब से ज़माना लग रहा है, वरना जॉर्ज ज़िंदा हों और इतने वर्ष कुछ बड़ा न हो यह असंभव था. कर्नाटक के एक पादरी परिवार के इस व्यक्ति ने परिवार से, समाज से बगावत करके ही समाजवादी राजनीति शुरू की, वह भी मुंबई में और सीधे एसके पाटिल से भिड़े और धूल चटा दी. जॉर्ज तब क्या रहे होंगे इसकी एक झलक तब भी दिखी जब इंदिरा गांधी रायबरेली से हारने के बाद कर्नाटक के बेल्लारी से उपचुनाव लड़ने गईं और जॉर्ज साहब ने विपक्ष का अभियान संगठित किया. मुंबई में जमने और राजनीति जमाने के तो अनगिनत किस्से हैं. पर यह सब उनकी दिलेरी, समझ, जबरदस्त भाषण कला और समाज के लिए कुछ करने की जबरदस्त इच्छाशक्ति से संभव हुआ. वे चुनाव लड़ने मुंबई नहीं गए थे. उनको ट्रेड यूनियन करना था और सारे स्थापित दलों -जिनमें कम्युनिस्ट और ...