दिल्ली हिंसा: सुप्रीम कोर्ट बोला- हम नहीं चाहते कि लोग मरें

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हिंसा को लेकर पीड़ितों की ओर से दायर एक याचिका को सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया है.

स याचिका में कपिल मिश्रा, अनुराग ठाकुर, परवेश वर्मा और अन्य पर कथित तौर पर दिल्ली में हिंसा भड़काने के लिए भड़काऊ भाषण देने के मामले में एफ़आईआर दर्ज करने की मांग की गई है.

सुनवाई में चीफ़ जस्टिस ऑफ़ इंडिया एस.ए. बोबडे ने कहा कि 'कोर्ट भी शांति चाहता है मगर उसे पता है कि उसके काम करने की भी कुछ सीमाएं हैं. इसमें यह तथ्य भी है कि कोर्ट तभी आदेश दे सकता है, जब कोई घटना हो चुकी हो.'

यह याचिका दिल्ली हिंसा के पीड़ितों की ओर से डाली गई है. याचिकाकर्ताओं की ओर से कोर्ट में पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंज़ाल्वेज़ ने अदालत से क़ानून के हिसाब से दख़ल देने की अपील की. कोर्ट चार मार्च, शुक्रवार को मामले की सुनवाई करेगा.

इसी तरह की एक याचिका दिल्ली हाई कोर्ट में भी लंबित है, जिस पर 13 अप्रैल को अगली सुनवाई होनी है.

चीफ़ जस्टिस एस.ए. बोबडे ने कहा, "हमारा मतलब यह नहीं है कि लोगों को मरने देना चाहिए. हममें इस तरह का दबाव झेलने की क्षमता नहीं है."

"हम घटनाओं को होने से रोक नहीं सकते. हम पहले से कोई राहत नहीं दे सकते. हम एक तरह का दबाव महसूस करते हैं... हम कोई घटना हो जाने के बाद ही हालात से निपट सकते हैं, इस तरह का दबाव होता है हमारे ऊपर, हम इसका सामना नहीं कर सकते."

"ऐसा लगता है मानो कोर्ट ही ज़िम्मेदार हो. हम अख़बार पढ़ रहे हैं और जानते हैं कि किस तरह की टिप्पणियां हो रही हैं. कोर्ट तभी कुछ कर सकते हैं जब कोई घटना हो जाए. कोर्ट इस तरह की चीज़ें नहीं रोक सकते."

सुप्रीम कोर्ट में दाख़िल इस याचिका में भड़काऊ भाषण देने वालों पर एफ़आईआर दर्ज करने की अपील के अलावा कुछ और आदेश देने की मांग भी रखी गई है.

इनमें दंगों की जांच के लिए दिल्ली से बाहर के अधिकारियों के एसआईटी बनाने और क़ानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए सेना की तैनाती की गुज़ारिश की गई है.

पुलिसकर्मियों की भूमिका की जांच के लिए रिटायर्ड जज के नेतृत्व वाली जांच कमिटी बनाने की मांग की भी गई है.

इसके अलावा पीड़ितों को राहत के तौर पर मुआवज़ा देने और पुलिस या अर्धसैनिक बलों द्वारा गिरफ़्तार किए गए लोगों की सूची सार्वजनिक करने के आदेश देने की भी अपील की गई है.

याचिकाकर्ताओं ने हिरासत में लिए गए लोगों को क़ानूनी सहायता दिलाने और हिंसा प्रभावित इलाक़ों, अस्पतालों वगैरह में प्रभावित लोगों को पका हुआ खाना मुहैया करवाने का आदेश देने की गुज़ारिश की है.

दंगा प्रभावित इलाक़ों में लगे सीसीटीवी कैमरों की फ़ुटेज को सुरक्षित रखने और पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट्स को जारी करने के निर्देश देने की भी मांग की गई है.

इसके अलावा यह भी कहा गया है कि सांप्रदायिक हिंसा की जांच और आपराधिक व्यवहार करने वाले पुलिसकर्मियों की पहचान के लिए रिटायर्ड जज को ज़िम्मेदारी सौंपी जाए ताकि ऐसे लोगों क़ानून सेवा से बर्ख़ास्त किया जा सके.

Comments

Popular posts from this blog

Отставку Евкурова связали с прошлогодним конфликтом с Чечней

أُنس جابر: لاعبة التنس التونسية تستمر بالتألق في بطولة أستراليا

لماذا لا يستطيع الأطباء القادمون من هذه الدولة العمل في بريطانيا؟